समय-समय की नही समझ-समझ की बात है। बचपन की यादे |

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एक वो दौर था जब पति भाभी को आवाज़ लगाकर अपने घर आने की खबर पत्नी को देता था,पत्नी की छनकती पायल और खनकते कंगन बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे। बाऊजी की बातों का ‘हाँ बाऊजी-जी बाऊजी’ के अलावा जवाब नही होता था। आज बेटा बाप से बड़ा हो गया, रिश्तों का केवल नाम रह गया। ये समय-समय की नही समझ-समझ की बात है। बीवी को तो दूर बड़ो के सामने हम अपने बच्चों तक को नही बतलाते थे। आज बड़े बैठे रहते है पर सिर्फ…

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