पूर्ण विशवास की कविता – जो तुझको अपना बना बैठे , उनको दीवाना क्यों समझे

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जब तेरे दर पर आ बैठे , कोई और ठीकाना क्यों समझे |
जो तुझको अपना बना बैठे , उनको दीवाना क्यों समझे |

 

जब तेरे हुए तेरे रहे , ये जादू नहीं करिश्मा भी नहीं |
यह तेरी ही बस रहमत है , कोई और बहाना क्यों समझे |
जो तुझको अपना बना बैठे , उनको दीवाना क्यों समझे |

 

साकी की नजरो से सबको , वहदत की मय मिल जाती है |
ए जाहिद यह तो काबा है , इसको मयखाना क्यों समझे |
जो तुझको अपना बना बैठे , उनको दीवाना क्यों समझे |

 

देखी जो जोत तो मुह चूमा , और खुद को जोत बना बैठे |
समां की खबर जो रखता है , उसको परवाना क्यों समझे |
जो तुझको अपना बना बैठे , उनको दीवाना क्यों समझे |

 

हर जर्रा तेरा है सद्गुरु , तुझको क्या भेट करू दाता |
जब दात तेरे युज्को ही दे , तब ये नजराना क्यों समझे |
जो तुझको अपना बना बैठे , उनको दीवाना क्यों समझे |

निर्मल जोशी जी ने यह कबिता लिखा है |

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