भगवान् श्री कृष्ण की अनमोल कहानी |गोपियों का विरह |

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आज किशोरी का हृदय कुछ अधिक ही धड़क रहा है। कारण, माँ ने घर पर रोक कर रखा है कि लाली आज घनघोर बादल हैं। खेलने बाहर मत जा। कभी भीं वर्षा हो सकती है। पर उनको क्या पता कि ये मुए काले बादल और शिद्दत से कान्हा की याद दिलाते हैं उन्हें ! सोचने लगी, श्याम भी मेरे विरह में तड़प रहे होंगे ! हाय ! प्रिय को सताना अच्छा नही। चली जाती हूँ। मैया तो गहरी निद्रा में हैं। धीरे से द्वार खोला और पायल के घुंघरुओं को घूर कर देखा, कि आवाज मत करना। दूर से देखा, श्याम सुंदर हाथ में बंसी लिए यमुना के पुलिन पर बैठे हैं। नेत्र बरसने लगे। परन्तु क्यों ? स्त्री सुलभ डाह से। एक दूसरी गोपी उनके समीप बैठी थी और दोनों हँस हँस कर बतिया रहे थे।  अरे इनको तो मेरी कोई परवाह नहीं, मैं सोच रही थी व्यथित और परेशान होंगे मेरे देरी तक ना आने के कारण !!  झर झर अश्रु बहने लगे। काजल कपोलों तक बहने लगा। मुखचन्द्र गुलाबी से लाल हो गया, बहुत क्रोध जो आया।
दौड़ती हुई समीप गई और बोली, अरि गोपी ! तू इधर बैठी है, वहां तेरा पति तुझे ढूंढ रहा है, तेरे मायके से सन्देश आया है कोई। अब तो गोपी को मन मारकर उठना पड़ा। श्याम सुंदर तिरछे नेत्रों से प्यारी को निहार रहे, कि बस अब पड़ी फटकार। पर राधा जी कुछ ना बोलीं। अपने बांये पैर के अंगूठे से मिट्टी खोदती, मुख नीचे कर चुपचाप बैठ गई।  श्याम अधीर हो गए। अपनी बंसी के अग्र भाग से राधा के कपोल को छुआ और बोले, आज तो बड़ी देर कर दी राधे ! हमारी याद ना आई क्या ? अब तो राधा रानी का धैर्य जवाब देने लगा, बंसी झपट कर हाथ से छीन ली। और मोटे मोटे मत्स्याकार नेत्रों से अश्रुपात करती बोली,

आपको क्या हमसे ? आपके प्रेम में दिवानी सैंकड़ों गोपियाँ हैं तो आपके पास !! अब तो श्याम सुंदर का धैर्य भी जवाब देने लगा, बोले राधे ! तुम जानती हो कि तुम मेरे लिए क्या हो! तुम्हारा स्थान इस जगत में कोई कभी नहीं ले सकता।  वो तो तुम्हारा प्रेम देखने के लिए हमने ठिठोली की थी। तुम जब ऐसे प्रेम जताती हो तो मेरे हृदय को शीतलता मिलती है। श्याम की बात सुनकर किशोरी जी मुस्कुरा दीं और बोली, तो हम भी तो ठिठोली कर रहे थे आपसे !! और उठकर यमुना के किनारे किनारे भागने लगी। लाल चुनरी सितारों जड़ी हवा में उड़ रही है, पाँव की पायल छम छम नहीं कर पा रही क्योंकि किशोरीजी का आदेश था चुप रहें। इसलिए घुंघरू हिल हिल कर प्रसन्नता व्यक्त कर रहे हैं।  काली लटें हवा में उड़ उड़ कर मोहन को बुला रही थीं। श्याम भी पीछे पीछे दौड़ रहे हैं। मनुहार कर रहे हैं कि राधे, बंसी दे दो, गैया को वापस बुलाना है।

परन्तु किशोरीजी नहीं रूकती, बार बार खिलखिलाते हुए मुड़ कर देखती हैं, दांये हाथ का अंगूठा दिखाकर चिढ़ाती हैं और भागती हैं।  तभी जोर की बिजली कड़कती है, झमझम मेघ बरसने लगते हैं। और श्यामा जी फिर भागती हैं, पर पलटकर, अपने श्याम की ओर।
जैसे ही पास आती हैं, श्याम से लिपट जाती हैं। मानो डर से कांपते हृदय को छुपने के लिए स्थान मिल गया हो।  श्याम अपने पीताम्बर से उनको ढ़क देते हैं ताकि वर्षा से कुछ बचाव हो। दोनों कदम्ब के बड़े वृक्ष के नीचे आश्रय लेते हैं।
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आश्चर्य !! सारे जगत, चर अचर, जड़, चेतन को आश्रय देने वाले लीला करने हेतु वृक्ष का आश्रय ले रहे हैं !!
साभार :- Braj Kishori

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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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