कर्तव्य -श्री ईश्वरचंद विद्यासागर जी से सीख

Ishwarchand
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इंग्लैंड मे एक जगह पर एक विशाल सभा की तैयारियां चल रही थी | भारतीय विद्वान भी अपने समय पर सभास्थल पर पहुच गए | यह क्या कोई सभास्थल पर नहीं बैठा था | भाषण सुनने आयी भीड़ भी एक तरफ खड़ी थी | भारतीय विद्वानों ने आयोजको से पूछा – यह भीड़ एक तरफ क्यों खड़ी है , सभास्थल पर क्यों नहीं बैठी |
आयोजको ने उत्तर दिया – सफाई कर्मचारी अभी तक आये नहीं है | इसलिए सफाई न होने के कारन ये लोग एक तरफ खड़े है | इसतरह से तो कार्यक्रम समय पर सुरु नहीं हो पायेगा |

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क्या करे – थोड़ी देर वेट तो करना ही पड़ेगा – आयोजको ने उत्तर दिया | थोड़ी देर और वेट करने के बाद जब सफाई कर्मी नहीं आये तो भारतीय विद्वानों ने खुद झाड़ू लेकर सफाई करना सुरु कर दिया | मुख्य आदमी को सफाई करते देख आयोजक आश्चर्य चकित रह गए | उन्होंने कहां आप क्यों कर रहे हो , यह कार्य आप को सोभा नहीं देता है |
विद्वान ने सर उठा कर कहा – किसी भी कार्य मे सोभा या असोभा नहीं है | प्रत्येक आदमी को अपना काम खुद करना चाहिए | दुसरो के भरोसे रहने वाले कभी भी सबल और सफल नहीं बन सकते है |
उनकी बात सुनकर आयोजको का सर शर्म से झुक गया | किसी भी काम को अच्छा या बुरा समझने वाले ये भारतीय विद्वान् कोई और नहीं बल्कि , श्री ईश्वरचंद विद्यासागर थे | जो महान समाज सुधारक और देश के स्वतंत्रा सेनानी थे |

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