आंशुओ की कीमत पर पुरस्कार नहीं – चैतन्य महाप्रभु की कहानी

chetanya mahaprabhu
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गंगा अपनी लहरो से किनारो को दुलारते हुवे मंद – मंद गति से  आगे बढ़ रही थी | तट पर मल्लाह , यात्रियों के आने के प्रतीक्षा कर रहा था | जितनी जल्दी हो सके वह नाव को पार ले जाना चाह रहा था | क्युकी आज दुसरी तरफ से ज्यादा यात्रियों के आने की आश थी | अचानक उसकी निगाह धीरे- धीरे आते दो नवयुकों पर पडी | वे आपस मे बात करते हुवे नाव की तरफ आ रहे थे , उसने उनको जोर से पुकारा और जल्दी से आने के लिए बोला |

नाव मे सवार होकर दोनों युवक आपस  मे बात  करने मे बिजी हो गए | उनकी बात का विषय था न्याय और शास्त्र पर लिखी किताबे | आज रात दरबार मे देश भर के लेखको की पुस्तको मे से किसी एक पुस्तक का चुनाव , पुरस्कृत करने के लिए होना था | उम्र मे काम दिखने वाले युवक ने दूसरे से उसकी पुस्तक देखने की लालसा रखी | युवक ने बिना किसी संकोच के पुस्तक पढ़ने के लिए दे दिया |

वह युवक पुस्तक पढ़ने मे बिजी हो गया , थोड़े देर के बाद युवक जोर – जोर से सिसकने लगा | उसकी सिसकियो की आवाज सुनकर दूसरा युवक का ध्यान भंग हो गया , उसने उससे रोने का कारन पूछा | उस लड़के ने उत्तर दिया – आपकी पुस्तक मेरी पुस्तक से बहुत अच्छी लिखी है , आप की पुस्तक जरूर पुरस्कार के लिए चुनी जायेगे | मेरा साधना , मेहनत सब आप की पुस्तक के कारण बेकार हो गया , अब यह सब कुछ आप को मिलेगा मुझको नहीं | नाव अब गंगा की बीच धारा मे पहुच गयी थी , पहले युवक ने अपनी पुस्तक ली और गंगा की धारा मे फेक दिया और बोला अगर यह पुरस्कार मुझको तुम्हारे आंशुओ की कीमत पर मिले तो मुझको स्वीकार नहीं है |

धारा मे पुस्तक प्रवाहीत करने वाले युवक – बेंगोल के संत चैतन्य  महाप्रभु थे , जिनके भक्ती गीतों की गूँज बेंगोल ही नहीं पूरी दुनिया मे प्रशिद्ध है | उन्होंने अपना पूरा जीवन दुसरो को सुखी बनाने मे लगा दिया |

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