गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी – एक बहुत ही सुन्दर कविता

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गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी–

गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी
जिह्वा भी गुस्से की ही भेंट चढ़ गयी
एक गुस्से में बोले एक तो दूजा चार बोलता
जिह्वा बेचारी सबके सामने शर्मसार हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी …………

 

गालियां  बकते एक दूजे को अचानक
आपस में ही मारामार हो गयी
एक ने चलाया हाथ दूजा करे पैर से वार
देखते देखते कुटमकाट हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ……….

 

एक ने सर फोड़ा तो दूजे ने हाथ तोड़ा
आपस में ही काटम काट हो गयी
एक ने लाठी उठाई तो दूजे ने पत्थर चलाये
देखते ही देखते खून की नदिया बह गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ……….

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जब तक आपस में लड़ थक कर चूर ना हुए
धुल धरती की चाटने को मजबूर ना हुए
तब तक एक दूजे के खून के प्यासे रहे बने
मानवता यहाँ शर्मसार हो गयी |
गुस्से से गुस्से की तकरार हो गयी ……….

होश आया तो शर्म से आंखे झुक गयी
अपनी करनी पर पश्चाताप बहुत हुआ
गाली गलौज कब हाथापाई पर ख़त्म हुई
गुस्से पर गुस्सा प्रभावी ना जाने कब हुआ
गुस्से से गुस्से की तकरार जब हुई
गुस्से से गुस्से की तकरार हुई
तकरार हुई ………………..
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माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु —

माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु
तेरे आँचल में रहकर सारा सुख पाया
गलतियों की सजा ज़रूर देता है ईश्वर
पर तू ही है जिससे हमेशा माफ़ी पाया।
तेरी बखान में पूरी पोथी लिख डालूँ
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ||
तेरा आँचल है ममता से भरा भरा
तेरे आँचल में ही है मेरा संसार सारा
सारे जहाँ ने जिसे कमजोर कह ठुकराया
उसे भी तूने ताउम्र अपने आँचल में छुपाया।
तेरी ममता के गुण जरा मैं गा लूँ
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ।।
माँ तूने गर्भ से ही है पाला मुझको
कष्ट हुआ न जाने कितना तुझको
है नहीं तुझे किसी भी दर्द का तनिक भी गम
तूने सहा मेरी नादानियों को सदा कहके कम
तूने अपनी ममता से हमेशा मुझे है दुलारा
मेरे कष्टों से तूने हमेशा मुझे उबारा
बहका जब कभी भी मेरा मन
तूने रास्ता दिखाया पथ-प्रदर्शक बन।
तेरे उपकारों के गुण जरा मैं गा लूँ
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ||
माँ तूने मेरा कितना दिया है साथ
बचपन में सिखाया चलना पकड़ कर हाथ
लिखना-पढ़ना भी तूने ही सिखाया
बोलना एवं सम्मान करना तूने ही समझाया
संस्कारों के छीटों से तूने
यह नन्हा पौधा किया बड़ा
पर आज जो तू हो गयी बूढी
बनना चाहिए था जब मुझको तेरी छड़ी
मैंने तेरे दिए उन संस्कारों को भुला दिया
अपने फर्ज को भूल तुझे अकेला छोड़ दिया।
अपने स्वार्थी तन-मन को निशदिन धिक्कारूं
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ||
माँ तूने मेरे छोटे से छोटे दुःख के लिए
अपनी सारी की सारी रैन है गंवाई
मुझे फूलों पर सुलाने के लिए
स्वयं काँटों पर ही सदा सोई
मेरा पसीना बहा है जहाँ
तूने अपना खून बहाया है वहाँ
मुझे तनिक खरोंच भी ना आये कहीं
तू ढ़ाल बनकर सदा साथ ही रही |
तेरे अहसानों के गुण जरा मैं गा लूँ
माँ तू भगवान से भी अधिक दयालु ||
माँ तू आज कहीं खो गई
शायद स्वर्ग लोक की रानी हो गई
जब तू नहीं है मेरे आसपास कहीं
तेरी कमी मुझको बहुत ही खली
बस मुझ पर एक कृपा करना माँ
हर जन्म में तू ही मेरी माँ बनना माँ|
ताकि तेरे आँचल का सुख फिर से मैं पा लूँ
क्योंकि तू तो है भगवान से भी अधिक दयालु।|
तेरा बखान करूँ अपार पर मैं शब्दहीन हूँ
मेरी माँ तेरे गुणों के आगे तो मैं दीनहीन हूँ।।
||सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
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संक्षिप्त परिचय
सम्पूर्ण नाम – सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
जन्मतिथि – १/६/७३
शिक्षा -ग्रेजुएट
लेखन की विधाएँ – लेखन विधा …लेख, लघुकथा, व्यंग्य, संस्मरण, कहानी तथा मुक्तक, हायकु -चोका और छंद मुक्त रचनाएँ |

प्रकाशित पुस्तकें – .पच्चीस के लगभग सांझा-संग्रहों में हायकु, लघुकथा और कविता तथा कहानी प्रकाशित |

प्रकाशन विवरण .. 170 के लगभग रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा बेब पत्रिकाओं में छपी हुई हैं रचनाएँ |दैनिक जागरण- भाष्कर इत्यादि कई अखबारों में भी रचनाएँ प्रकाशित |
पुरस्कार/सम्मान –  “महक साहित्यिक सभा” पानीपत में २०१४ को चीफगेस्ट के रूप में भागीदारी |
“कलमकार मंच” की ओर से “कलमकार सांत्वना-पुरस्कार” जयपुर (३/२०१८)
“हिन्दुस्तानी भाषा  साहित्य समीक्षा सम्मान” हिंदुस्तान भाषा अकादमी (१/२०१८)
“शब्द निष्ठा सम्मान”  जयपुर (२०१७)
जयविजय  वेबसाइट द्वारा  लघुकथा विधा में ‘जय विजय रचनाकार सम्मान‘  लखनऊ (२०१६)
डाक का सम्पूर्ण पता – सविता मिश्रा
w/o देवेन्द्र नाथ मिश्रा (पुलिस निरीक्षक )
फ़्लैट नंबर -३०२ ,हिल हॉउस
खंदारी अपार्टमेंट , खंदारी
आगरा २८२००२
मोबाइल नंबर – 09411418621
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